Poem: Khoya Hissa

एक अरसा हुआ –
दरिया किनारे खेलते हुए ,
कुछ भूल आया हूँ .
पर कुछ तो है ;Khoya_Hissa_rajesh_kumar_joshi
जो अपने वजूद से जुड़ा है.
शायद , एक टुकड़ा खुद का .

बहुत याद करता हूँ ,
पर याद नहीं आता .
जैसे रेत का कोई टुकड़ा ,
किनारे पर ही खो जाये .
और फिर इसकी,
कोई शक्ल भी तो नहीं , रंग नहीं ,
और न कोई आवाज़ .
बस चुप सा , कुछ – कुछ सहमा ,
एक नज़र पड़े , तो सिमटता सा , छुपता सा .

यूँ तो महसूस नहीं होता,
पर अक्सर समंदर के पास ,
रेत की खरास में चुभता है .
किसी अधभरे घाव की तरह .

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